10 Feb 2011

कश्मकश!!

कश्मकश!!

जानते है हम उन्हे
और पहचानते  भी खूब है!
पर, पहचान जताने से
कतराते भी बोहोत है...

चाहते है ये भी की
उन्हे हम कभी ना देखे!
पर, हर रोज खाबो में देख के
जागते भी बोहोत है...

रखते है तमन्ना ये भी की
उन्हे दिल से भुला दे!
पर, इसी दिल को उनकी
इबादते भी बोहोत है...

शिकवे भी हजारो है,
शिकायते भी लाखो है!
इस दिल में मगर उनकी
मोहोब्बते भी बोहोत है...

देखे तो पी के जरा
ये ज़हर-ए-मोहोब्बत!
सुनते है की इस ज़हर में
सुकून भी बोहोत है...
               - राहुल मुळे

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